Tuesday, December 17, 2013

ऐसे बिखरे है



ऐसे बिखरे है रात दिन जैसे, मोतियो वाला हार टूट गया..
तुमने मुझको पिरो के रखा था .. तुमने मुझको पिरो के रखा था!!!

Thursday, December 12, 2013

यूँ होता तो क्या होता !



न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझको होने ने न मैं होता तो क्या होता !


हुआ जब गम से यूँ बेहिश तो गम क्या सर के कटने का,
ना होता गर जुदा तन से तो जहानु पर धरा होता!
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता !

बाद मरने के मेरे



चन्द तसवीरें-बुताँ चन्द हसीनों के ख़ुतूत,
बाद मरने के मेरे घर से यह सामाँ निकला ।

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है



आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है
ताक़ते-बेदादे-इन्तज़ार नहीं है

देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले
नश्शा बअन्दाज़-ए-ख़ुमार नहीं है

गिरिया निकाले है तेरी बज़्म से मुझ को
हाये! कि रोने पे इख़्तियार नहीं है

हम से अबस है गुमान-ए-रन्जिश-ए-ख़ातिर
ख़ाक में उश्शाक़ की ग़ुब्बार नहीं है

दिल से उठा लुत्फे-जल्वाहा-ए-म'आनी
ग़ैर-ए-गुल आईना-ए-बहार नहीं है

क़त्ल का मेरे किया है अहद तो बारे
वाये! अगर अहद उस्तवार नहीं है

तू ने क़सम मैकशी की खाई है "ग़ालिब"
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है

एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई



तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई

मुहब्बत थी चमन से



न होगा यक बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा
हुबाब-ए-मौज-ए-रफ़्तार है, नक़्श-ए-क़दम मेरा

मुहब्बत थी चमन से, लेकिन अब ये बेदिमाग़ी है
के मौज-ए-बू-ए-गुल से नाक में आता है दम मेरा

दिल भी जल गया होगा



जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

अंदाज़-ए-गुफ़्तगू



हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

विसाले यार

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता



काजी भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास में...
उतरा है राम-राज्य विधायक निवास में...

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत...
इतना असर है खादी के लिबास में...

हम में कोई हून, कोई शक, कोई मंगोल है...
दफ़न है जो बात अब उस बात को मत छेडिये...

है कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज खान...
मिट गए सब, कौम की औकात को मत छेडिये...

छेडिये एक जंग मिलजुल कर गरीबी के खिलाफ...
दोस्त मेरे मजहबी नगमात मत छेडिये....

सफ़र में



सफ़र में मुश्किलें आये तो हिम्मत और बढती है...
कोई जब रास्ता रोके तो जुर्रत और बढती है...
अगर बिकने पर आ जाओ तो घट जाते है दाम अक्सर...
न बिकने का इरादा हो तो कीमत और बढती है...