Thursday, December 12, 2013

हम में कोई हून, कोई शक, कोई मंगोल है...
दफ़न है जो बात अब उस बात को मत छेडिये...

है कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज खान...
मिट गए सब, कौम की औकात को मत छेडिये...

छेडिये एक जंग मिलजुल कर गरीबी के खिलाफ...
दोस्त मेरे मजहबी नगमात मत छेडिये....
Categories:

0 comments:

Post a Comment